
कोरबा। जिले में शिक्षा रथ के नाम पर शिक्षकों से सहयोग राशि लिए जाने के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि शिक्षकों से 200 रुपये सहयोग राशि देने संबंधी कोई शासकीय आदेश जारी नहीं किया गया था। साथ ही व्हाट्सएप ग्रुप में भ्रामक सूचना प्रसारित करने के मामले में संबंधित संकुल शैक्षिक समन्वयक को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया।
इसी बीच अब इस पूरे मामले को लेकर प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका और कथित मौखिक निर्देशों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि शिक्षा रथ के जिले में निकलने से पहले कटघोरा और पोड़ी-उपरोड़ा क्षेत्र में बैठकें आयोजित की गई थीं। इन बैठकों में किन-किन अधिकारियों या कर्मचारियों को बुलाया गया था, बैठक में क्या चर्चा हुई और क्या कोई मौखिक निर्देश दिए गए—यह अब जांच का विषय बन गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा रथ के लिए सहयोग राशि से संबंधित कोई लिखित आदेश पहले जारी हुआ था या पहले बैठक लेकर मौखिक निर्देश दिए गए थे? यदि कोई लिखित आदेश जारी नहीं हुआ था तो फिर शिक्षकों तक 200 रुपये सहयोग राशि देने की सूचना किसके निर्देश पर पहुंची? और यदि यह निर्देश किसी अधिकारी के नाम पर दिया गया था तो इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है?
क्या छोटे कर्मचारी अपने स्तर पर इतनी बड़ी पहल कर सकते हैं?
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहा है। क्या किसी छोटे स्तर के कर्मचारी या संकुल स्तर के अधिकारी में इतनी हिम्मत हो सकती है कि वह जिला शिक्षा अधिकारी के नाम का हवाला देकर जिलेभर के शिक्षकों से सहयोग राशि लेने की पहल करे?
यदि वास्तव में किसी कर्मचारी ने अपने स्तर पर ऐसा किया है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। वहीं यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी के मौखिक निर्देश या सहमति से यह प्रक्रिया आगे बढ़ी, तो फिर इसकी जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है।
पत्रकारों से व्यवहार पर भी सवाल
मामले को लेकर सवाल पूछने पहुंचे पत्रकारों के साथ कथित तौर पर किए गए व्यवहार को लेकर भी चर्चा है। यदि किसी पत्रकार द्वारा सरकारी कार्यालय में जाकर किसी शासकीय आदेश, विभागीय कार्रवाई या सार्वजनिक हित के मामले में सवाल पूछा जाता है, तो क्या उसे कार्यालय में आने से रोका जा सकता है?
सरकारी कार्यालय सार्वजनिक कार्यों के संचालन के लिए होते हैं। किसी पत्रकार को कार्यालय में प्रवेश या सवाल पूछने से रोकने के संबंध में यदि कोई नियम या लिखित आदेश है, तो उसे भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
क्या प्रभारी DEO कार्यालय में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर कोई लिखित आदेश जारी कर सकते हैं? यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है, तो फिर पत्रकारों को मौखिक रूप से रोकने का अधिकार किसे है—यह भी सवालों के घेरे में है।
अब प्रभारी DEO से सीधे सवाल
शिक्षा रथ के नाम पर शिक्षकों से कथित सहयोग राशि लेने के मामले में अब प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी से कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं—
1. शिक्षा रथ के लिए शिक्षकों से 200 रुपये सहयोग राशि लेने का निर्देश किसने दिया?
2. क्या प्रभारी DEO कार्यालय से ऐसा कोई लिखित आदेश जारी हुआ था?
3. यदि लिखित आदेश नहीं हुआ तो शिक्षकों तक यह सूचना कैसे पहुंची?
4. शिक्षा रथ निकलने से पहले कटघोरा और पोड़ी-उपरोड़ा में क्या बैठक हुई थी?
5. इन बैठकों में कौन-कौन अधिकारी और कर्मचारी मौजूद थे?
6. क्या बैठकों में सहयोग राशि लेने के संबंध में कोई मौखिक निर्देश दिए गए?
7. यदि किसी कर्मचारी ने DEO के नाम पर राशि मांगने की बात कही, तो उसके खिलाफ विभाग ने क्या कार्रवाई की?
8. पत्रकार द्वारा सवाल पूछे जाने पर उसे कार्यालय आने से रोकने या पत्रकार को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आधार क्या था?
फिलहाल जिला प्रशासन द्वारा 200 रुपये सहयोग राशि के संबंध में कोई शासकीय आदेश जारी नहीं होने की बात सामने आने के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिक्षकों से सहयोग राशि लेने की पहल आखिर किस स्तर से हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।

