
बांकी मोंगरा। नगर पालिका परिषद बांकी मोंगरा में स्वच्छता दीदियों के लिए जूते और रेनकोट की खरीदी दर को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर स्वच्छता दीदियों से जूते उपलब्ध कराने के नाम पर चार-पांच बार पैरों का नाप लिए जाने के बावजूद जूते नहीं मिलने की बात सामने आ रही है, तो दूसरी ओर बरसात समाप्त होने के बाद रेनकोट खरीदी दर की प्रक्रिया ने नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे मामले में मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) की भूमिका के साथ-साथ प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल (PIC) के सदस्यों की जवाबदेही पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्वच्छता दीदियों के लिए जूते और रेनकोट जैसी जरूरी सामग्री खरीदी की गईं थी, तो उन्हें समय पर उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया? क्या खरीदी दर की प्रक्रिया में देरी हुई, क्या सामग्री खरीदी गई है या नहीं, और यदि खरीदी हुई है तो उसका वितरण कहां अटका है? इन सवालों पर नगर पालिका प्रशासन की ओर से स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
चार-पांच बार पैरों का नाप, फिर भी जूते कहां हैं?
स्वच्छता दीदियां शहर की सफाई व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। तेज धूप हो, बारिश हो या गंदगी से भरी सड़कें—वे नियमित रूप से अपने काम में जुटी रहती हैं। ऐसे में उनके लिए जूते और अन्य सुरक्षा सामग्री उपलब्ध कराना नगर पालिका परिषद की जिम्मेदारी है।
लेकिन आरोप है कि स्वच्छता दीदियों से जूते देने के लिए चार-पांच बार पैरों का नाप लिया गया, इसके बावजूद आज तक उन्हें जूते नहीं मिले। यदि ऐसा है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नाप लेने की प्रक्रिया बार-बार क्यों दोहराई गई? क्या जूतों की खरीदी हुई, क्या आपूर्तिकर्ता को भुगतान किया गया और यदि भुगतान हो चुका है तो जूते संबंधित कर्मचारियों तक क्यों नहीं पहुंचे?
जूते के लिए बार-बार नाप और वितरण का इंतजार—आखिर इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी किसकी है?
नगर पालिका प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि जूता खरीदी के लिए कितनी राशि निर्धारित की गई, कितने जोड़ी जूते खरीदे गए, किस फर्म से खरीदी हुई और अब तक कितनी स्वच्छता दीदियों को जूते वितरित किए गए हैं।
बरसात गुजर गई, अब रेनकोट खरीदी की याद क्यों आई?
रेनकोट खरीदी को लेकर भी सवाल कम नहीं हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 5 अक्टूबर को पीआईसी की बैठक में निकाय कर्मचारियों और स्वच्छता दीदियों के लिए रेनकोट खरीदी की दर स्वीकृति से संबंधित विषय रखा गया था। बताया गया है कि जेम पोर्टल के माध्यम से 208 रेनकोट खरीदे जाने की प्रक्रिया पर विचार किया गया।
ऐसे में सवाल है कि जब बरसात का मौसम लगभग समाप्त हो चुका है, तब रेनकोट खरीदी की प्रक्रिया को स्वीकृति देने की नौबत क्यों आई? क्या इसकी आवश्यकता का आकलन समय रहते नहीं किया गया था? यदि खरीदी की जरूरत पहले से थी, तो बरसात के दौरान ही स्वच्छता दीदियों और कर्मचारियों को रेनकोट उपलब्ध कराए गए तो खरीदी और एक रेनकोर्ट की क़ीमत क्या थी?
स्वच्छता दीदियों को बारिश के दौरान काम करना पड़ता है। यदि उन्हें समय पर रेनकोट मिलते, तो इसका वास्तविक लाभ उसी मौसम में मिलता। अब बरसात गुजर जाने के बाद खरीदी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्णय पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, खरीदी दर का प्रस्ताव 5 अक्टूबर को सामने आने और वास्तविक ऑर्डर, आपूर्ति या भुगतान की तारीखों के बीच अंतर हो सकता है। इसलिए नगर पालिका को पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
PIC सदस्यों की मौन सहमति पर सवाल
इस पूरे मामले में पीआईसी सदस्यों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि 5 अक्टूबर को रेनकोट खरीदी की दर स्वीकृति का विषय बैठक में रखा गया और सदस्यों ने बिना किसी सार्वजनिक आपत्ति के सहमति दे दी।
यदि बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति बनी, तो क्या सदस्यों ने यह जानने की कोशिश की कि रेनकोट की जरूरत किस समय थी? क्या स्वच्छता दीदियों को पहले से जूते उपलब्ध कराए गए थे? क्या पुरानी खरीदी और वितरण का हिसाब देखा गया? क्या दरों की उचितता, खरीदी की आवश्यकता और भुगतान की प्रक्रिया पर चर्चा हुई?
इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है। पीआईसी के सदस्यों का दायित्व केवल प्रस्तावों पर सहमति देना नहीं, बल्कि जनहित से जुड़े निर्णयों पर आवश्यक सवाल उठाना और खर्च की पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी है।
यदि खरीदी से संबंधित सभी पहलुओं की जांच किए बिना प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, तो यह भी जवाबदेही का विषय है। हालांकि, केवल सहमति दिए जाने से किसी सदस्य की मिलीभगत या अनियमितता सिद्ध नहीं होती। इसके लिए बैठक की कार्यवाही और संबंधित दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
CMO और PIC से जनता पूछ रही है—जूते और रेनकोट का हिसाब कहां है?
नगर पालिका परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी और पीआईसी सदस्यों को अब इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
– स्वच्छता दीदियों के जूते खरीदने के लिए कितनी राशि स्वीकृत की गई?
– क्या जूतों की खरीदी पूरी हो चुकी है? यदि हां, तो वितरण क्यों नहीं हुआ?
– स्वच्छता दीदियों से चार-पांच बार नाप लेने के बावजूद जूते नहीं मिलने की शिकायत पर प्रशासन का क्या कहना है?
– 5 अक्टूबर की पीआईसी बैठक में 208 रेनकोट की दर स्वीकृति के लिए कौन-सा प्रस्ताव रखा गया था?
– रेनकोट खरीदी की कुल लागत कितनी है और किस फर्म को आपूर्ति का काम दिया गया?
– क्या रेनकोट की आपूर्ति और भुगतान हो चुका है, या प्रक्रिया अभी लंबित है?
– क्या जूते और रेनकोट की खरीदी एवं वितरण से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएंगे?
इन सवालों के जवाब सामने आने से ही स्पष्ट हो सकेगा कि मामला केवल खरीदी में देरी का है या इसमें किसी प्रकार की वित्तीय अथवा प्रक्रियागत अनियमितता भी हुई है।
जनता के पैसे का हिसाब देना ही होगा
नगर पालिका में खर्च होने वाला पैसा जनता की गाढ़ी कमाई और सार्वजनिक राजस्व का हिस्सा है। इस पैसे का उपयोग पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। यदि स्वच्छता दीदियों के लिए जूते और रेनकोट खरीदने के नाम पर राशि खर्च की गई है, तो संबंधित सामग्री का वास्तविक वितरण सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
एक तरफ स्वच्छता दीदियां जूतों के इंतजार में हैं और दूसरी तरफ बरसात बीतने के बाद रेनकोट खरीदी की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में नगर पालिका प्रशासन को चुप्पी साधने के बजाय खरीदी से जुड़े दस्तावेज, स्वीकृत राशि, भुगतान की स्थिति और वितरण का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।
यह जनता का पैसा है, इसलिए एक-एक रुपये का हिसाब जनता को जानने का अधिकार है। सवाल उठाना किसी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग करना है। अब देखना यह है कि बांकी मोंगरा नगर पालिका की CMO और पीआईसी सदस्य इन सवालों का क्या जवाब देते हैं और स्वच्छता दीदियों को उनके जूते व रेनकोट आखिर कब तक मिलते हैं।प्रकाशन के लिए महत्वपूर्ण: यदि आपके पास जूता खरीदी की राशि, बिल, भुगतान या वितरण संबंधी दस्तावेज हैं, तो उनसे खबर को और मजबूत किया जा सकता है। बिना दस्तावेजी प्रमाण के CMO और PIC सदस्यों को सीधे घोटाले में शामिल बताने के बजाय आरोपों और सवालों के रूप में खबर प्रस्तुत करना अधिक तथ्यात्मक और सुरक्षित रहेगा। CMO और संबंधित PIC सदस्यों का पक्ष भी अवश्य शामिल करें।

