सूत्रों के अनुसार
कोरबा मेडिकल कॉलेज में कोरबा और आसपास के लोग आते हैं, जहां उन्हें बेहतर और सस्ता इलाज मिलेगा
इलाज की उम्मीदें या तारीखों का खेल?
कहने को तो यह जिला मेडिकल कॉलेज है, जहां कोरबा और आसपास के लोग आते हैं, जहां उन्हें बेहतर और सस्ता इलाज मिलेगा।
अल्ट्रासाउंड कक्ष के बाहर लंबी लाइन और हाथों में पर्चियां के लिए परेशान लोग
“कोरबा मेडिकल कॉलेज में सोनोग्राफी के लिए एक डेढ़ महीने बाद की तारीख दी जा रही है। अब सवाल यह है कि जिस मरीज को सटीक जांच की जरूरत है, उसे क्या बीमारी है यह बोलेगा कि ‘रुक जाओ, अभी मेरी सरकारी तारीख नहीं आई है’?”

“साहब, डॉक्टर ने कहा है कि पेट में बहुत दिक्कत है, तुरंत जांच कराओ। यहां आए तो कह रहे हैं कि एक से डेढ़ महीने बाद आ आना। अब हम गरीब लोग प्राइवेट में 1500-2000 रुपए कहां से दे पाएंगे? अगर इस बीच मरीज को कुछ हो गया, तो ये अस्पताल वाले की जिम्मेदारी क्या है?”

“जिम्मेदारी… यह शब्द शायद अस्पताल के डिक्शनरी में ही नहीं है। अगर इंतजार के दौरान किसी मरीज की स्थिति बताई जाए या उसकी जान चली जाए, तो उसका जिम्मेदार कौन? इस बीमारी को परेशान करने का कोई नया तरीका नहीं है? या फिर ऐसी स्थिति पैदा होने की फिर भी क्या हो रही है, ताकि मजबूरी में सभी निजी सोनोग्राफी सेंटरों का रुख किया जा सके, जहां उनकी ?”
” जवाब जानने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को फोन किया जाता है, तो उनके फोन या तो ‘बिजी’ आ जाते हैं या फिर वे मुनासिब नहीं जाते हैं। एयरकंडिशन कार्यलय में बैठे साहबों को शायद ही बाहर धूप में लाइन में लगें, लेकिन इन अधिकारिओ को किसी दर्द नहीं दिखता,”
“प्रशासन को यह स्वास्थ्य सेवा ‘दान’ नहीं, बल्कि जनता का ‘अधिकार’ है।
एक बड़ा सवाल एक दिन में कितनी सोनोग्राफी हो रही है और कितने लोग पेंडिंग हैं।
निजी सेटिंग का शक: जिला अस्पताल के पास स्थित निजी सेवाओं से मतलब है?












